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Friday, 2 September 2016

गुरु महिमा

गुरु करे अज्ञान दूर, गुरु ज्ञान सिखाए रे|
शिक्षा सार है जीवन का, वह ही बतलाए रे|
आप उतारें जीवन में, फिर देता है शिक्षा,
करें आंकलन क्या है सीखा, लेकर परीक्षा
दिया दंड यदि, उसमें भी है उन्नति की इच्छा
उन्नति या फिर मिले सफलता वह हर्षाए रे||
खेल-खेल में, बात बात में, बांटे सबको ज्ञान,
अपना हो या कोई पराया सबको दे सम्मान,
वह कहता अपने शिष्यों से करना सबका मान,
जब भी हो संपर्क गुरु से मिल अठलाए रे||
प्रथम गुरु माँ शीश झुकाऊँ, प्रभु सदा आभारी,
जिस ने बोल दिए जिव्या को, गुंजाई किलकारी,
कभी डांट कर, कभी प्यार से, हम में सीख उतारी,
रोने और हंसने पर अपना साथ निभाए रे||
शिक्षक का निस्वार्थ प्रेम है, नहीं स्वार्थ का नाता,
इसीलिए स्थान गुरु का सबसे ऊपर आता,
गुरु स्वार्थ से ऊपर है और उस से आगे माता,
छात्र हुए जब सफल गुरु का मान बढ़ाएं रे||
गुरु करे अज्ञान दूर, गुरु ज्ञान सिखाए रे||

निर्दोष त्यागी

Wednesday, 31 August 2016

बिछोह

मैं ही तुमसे मिलना चाहूं
तुम्हें नहीं क्या उत्कंठा है?
बूंद नहीं सागर भरती तो
स्वयं बूंद का अस्तित्व ही क्या है?
तुम्हें नहीं आतुरता मेरी
मैं ही क्यों संघर्ष करूं फिर!
शक्तिमान तुम मैं अबला हूं
मिलन प्रयास तदपि मेरा है.
देव खींच लो बाँह पकड़ कर
ताकि निर्भय मैं हो जाऊं
भक्त सदा भगवान के प्रिय
हृदय निवास स्थान तेरा है.
जब हो साथ सदा मेरे तुम
सिर्फ भय क्या और चिंता कैसी?
दायित्वों की पूर्ति हेतु हम
कार्य सकल भव का तेरा है
संचालन तो प्रकृति सुलभ है
व्यर्थ करें चिंता हम जैसे,
होना है वैसे ही होता
क्यों नर चिंता ने घेरा है.
तुम मेरे मैं सदा तुम्हारी
दासी सखी या भक्तिन समझो
अंश तुम्हारा ही मुझ में है
तुम से ही तो प्राण मिला है.
ममता की फुलवारी सींची
फूल लगाए रंग-बिरंगे
कब समेट लो अपनी लीला
यह सब तो अधिकार तेरा है.
मुझको अचरज तब होता है
जब प्रिय का बिछोह होता है
तुम्हें नहीं क्या दुख होता तब
जब कृतित्व तू समेटता है.

निर्दोष त्यागी

Saturday, 27 August 2016

उबाल

उबाल दूध का,
उबाल सागर का,
उबाल मनुष्य के क्रोध का!
तूफान सा है भयंकर,
उठा दे पहाड़ को,
हिला दे पृथ्वी को,
सही दिशा मिले तो,
उबाल संबंध का,
समर्पित जीवन कर देता है!
मिटा देता है स्वयं को,
उबाल प्रेम का,
निस्वार्थ भाव से कराता है सेवा|
उबाल है शक्ति असीम,
उबाल है साहसी भीम,
उबाल कराए तकरार,
उबाल बढ़ाए रार,
उबाल है घमासान,
उबाल जो छीन ले जान,
खो दे जो बुद्धि विवेक,
शत्रु बना देता है अनेक,
उबाल रोकना है कठिन,
बदल सकता है हमारे दिन,
उबाल लांघ दे सागर को,
उबाल फाड़ दे धरा को,
उबाल डाल दे पत्थर में जान,
उबाल मौत से छीन ले संतान,
उबाल उत्साह का दूसरा नाम,
सामान्य बना देता है महान!

निर्दोष त्यागी

उद्गार

ह्रदय के उद्गारों को शब्दो का जामा पहनाने का प्रयास किया है. आपके सुझाव, परामर्श, अभिव्यक्ति में रही चूक आदि के माध्यम से स्वयं में सुधार करने का प्रयास करुँगी. आशा करती हूँ ये कविताएँ आपके हृदय को स्पर्श करेंगी.
निर्दोष त्यागी